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बस एक बार आ जाएँ, मासूम बचपन कि तरह.....


सुजय थोड़ा परेशान लग रहा था,रोज कि तरह सुबह टहलने निकला,रोज वों नजदीकी पार्क में जाता था वहाँ उसके दोस्त भी आया करते थे, उसे बातें कर ने का बहुत शौक था,लेकिन आज वों गुमसुम सा था,अपने ही धुंध में चला जा रहा था....

उसे बैठे हुए अपने दोस्तों को भी अनदेखा कर दिया, उसके जिगरी दोस्त अनिल ने उसे कितनी आवाजें दी लेकिन उसका ध्यान ही नहीं था, वों आगे जाकर एक बेंच पर बैठ गया, बहुत देर कुछ सोचने के बाद उसने जेब में से फोन निकाला फिर उस फोन को निहारता रहा और फिर से जेब में डाल दिया,ऐसे उसने तीन चार बार किया, ये सब वहाँ से अनिल देख रहा था उसे समझ नहीं आ रहा था के सुजय ऐसा क्यों कर रहा हैं, वों उसके पास गया, उसके नजदीक जाने के बाद भी उसे अनिल के आने का पता नहीं चला वों अभी भी अपने खयालों में ही खोया था,अनिल ने उसके कंधे पर हाथ रखते ही वों चौक गया, अरे अनिल तुम (जैसे कुछ हुआ नहीं हैं ऐसे अंदाज से उसने पूछा)अरे तुमने मुझे अभी नोटिस किया? मैं तो कबसे तुम्हें आवाज दे रहा हूँ, तुम्हारा तो ध्यान ही नहीं हैं,बस तुम अपने ही ख़यालों में खोये हों,क्या हुआ सब ख़ैरियत से तो हैं, चिंकी कि तबीयत ठीक हैं ना,भगवान करें चिंकी हमेशा खुश रहे सुजय झट्ट से बोला,

अनिल : फिर तुम इतने परेशान क्यों हो तुम्हें तो खुश होना चाहिए दो दिन पहले ही तुम्हारी बेटी चिंकी कि शादी हो गई,तुम्हारी एक बेटी हैं और वों भी खुश हैं अपने ससुराल में,और अगर तुम्हें उसकी याद आ रही है तो एक फोन कर लो उसे भी अच्छा लगेगा..

सुजय : तुम्हें क्या लगा मैंने उसे फोन लगाया नहीं?

अनिल : तो उसने बात कि ना तुमसे तो फिर रोनी सूरत क्यों बनाये हो यार..

सुजय : बात कि उसने लेकिन….ऐसा लग रहा था वों अपने पापा से नहीं किसी अजनबी से बात कर रहीं हों,पाँच मिनट भी बात नहीं कि उसने एकदम से बोल दिया मैं फोन रखती हूँ पापा मुझे बहुत काम हैं..

वों जब शादी करके ससुराल चली गई तब भी मुझे इतना दर्द नहीं हुआ जितना उसकी इस एक बात से हुआ,जो बेटी,जिसका दिन पापा से शुरू होता था,और पापा पे खत्म होता था,आज वहीं बेटी घडी के कांटों पर मुझ से बात कर रहीं थी,सारा दिन मेरा खयाल रखती थी उस चिंकी ने ये तक नहीं पुछा आपने खाना खाया के नहीं..

अनिल : अरे वों अभी ससुराल में हैं वों उन लोगों के इजाजत के बीना कुछ कर नहीं सकती..

सुजय : वहीं तो अनिल हम आदमी कितने स्वार्थी होते हैं,जो बेटियां जिंदगी भर हमारा खयाल रखती हैं, हम उन्हीं बच्चियों को अपने झूठी शान और इज्जत के लिए पराये घर पराये लोगों के हाथ सौंप देते हैं

और जब वों पराये लोगों को अपना मान कर उन के जिम्मेदारी के बोझ तले दब जाती हैं तो हम रोने लगते हैं कि बेटी माँ बाप को भूल गई..


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credit: third party image reference


लेकिन वों भूली नहीं होती,वों दोनों घर कि जिम्मेदारी बखूबी निभाती हैं,उलटा हम ही उन नन्हे हाथों में जिम्मेदारियों का बोझ देकर अपने कर्तव्य से पल्ला झटक देते है

अनिल : सुजय तूम घर जाओ,तूम बहुत थक गये हो…घर जाओगे तो तुम्हें अच्छा लगेगा....

सुजय : घर जाकर क्या करूं?वों खाली घर मुझे खाने को दौडता है,जब उस घर मे बेटी थी तो वों घर घर लगता था,वों थी जिसकी रौनक से घर मे उजाला रहता था,उसकी बातें सुनते दिन कैसे निकल जाता?पता ही नहीं चलता था, जबसे उसकी शादी हो गई तबसे घर जाने के लिए कदम ही नहीं उठते......

अनिल : अरे दोस्त मेरे बेटियां तो पराई हीं होती हैं,उनको एक दिन उनके अपने घर जाना हीं पडता हैं, बेटियों के साथ इतनी लगाव अच्छा नहीं होता,इस जालिम दुनिया कि रीत ही अजीब है दोस्त...

सुजय : मालूम है मुझे अब वो नहीं आयेगी,फिर भी एक पिता चाहता है वो आ जाए फिर से ठंडी सुबह कि तरह, वो आ जाए करहाती गरमी मे रेशमी धूप कि तरह,मेरी लाडली कब इतनी बडी हो गई पता ही नहीं चला?सबका बोझ अपने कंधों पर उठाने लगी हैं, उसका एक एक पल सब मे बंटा हुआ हैं,सबके लिए जीते जीते अपने लिए जीना भूल गई हैं,हर एक का खयाल रखते खुद थक जाती हैं, लेकिन पापा को बुरा न लगें इसलियए दिखाती नहीं हैं........ बस वक्त निकालके एक बार आ जाए,एक बार फिर से छोटी सी गुड़िया बनके आ जाए,थके हुए उसके तन को फिर से बचपन कि तरह अपने कंधों पर उठा लूंगा,शायद उसकी थकान कुछ तो कम हो जाए?बस एक बार आ जाए...... किसी की बहू बनके नहीं, किसी की पत्नी बनके नहीं,किसी की माँ बनके नहीं बस एक बार आ जाए,मेरी बेटी बनकर......बस एक बार आ जाए, बस एक बार आ जाए......

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कहते कहते उठकर सुजय जाने लगा,औऱ अनिल उसकी जाती हुई परछाई देख रहा था,उसकी परछाई भी उसीकी तरह अकेली थी......

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