इन ख्वाबों के जंगल मे....
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रात कि ग़ली से ।
बच बच निकलते हैं हम ।
डर लगता हैं.....
कहीं इन ख्वाबों के जंगल मे फंस ना जाये....
और कभी इस रात कि आगोश मे सो भी गये तो ।
सुबह के उजालों से डर लगता हैं.....
कहीं इन उजालों के शोर से ।
रात कि मेहरबानी से मिले हुए वो ख्वाब टूट ना जाये....
ज़नाब डर ना ही अंधेरों से लगता हैं ।
ना ही उजालों से लगता हैं..
बस डर लगता हैं.....
इन रातों और उजालों कि कश्मकश मे ।
ख्वाबों का हाथ कहीं ।
सच के दहलीज तक आते आते छूट ना जाये.....

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