नमस्कार दोस्तों, आप सभी को जागतिक महिला दिवस की शुभकामनाएं..
उन सभी महिलाओं को मेरा सलाम, जिन्होंने कडी मेहनत से अपना मकाम हासिल किया हैं, लेकिन मेरी आज कि कविता उन महिलाओं को समर्पित हैं जो समाज के खोकले नियमो को तोड़ कर सन्मान से जीना चाहती हैं....
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| Women's day poem |
Women's day poetry | जागतिक महिला दिन कि कविता
चूडियां है ये ? या बेडियां पहना दी हैं.....
चूडियां है ये ? या बेडियां पहना दी हैं ।
खुबसूरती के नाम पर मुझे कठपुतली बना दी हैं..
दोगला समाज..
रिश्तों कि आड मे खिलवाड़ करता आया है ये समाज ।
मुझसे ही बलिदान मांगता आया है ये दोगला समाज,
रिश्तों के नाम पर अपने हिसाब से मुझे जरुरत बना दी हैं....
चूडियां चूभती है हाथों मे मेरे..
ये चूडिय़ों है कि शोर मचाती जाती है, इन आवाजों मे ।
मेरे सपनों कि आवाज़ दबती चली जाती है,
अब ये चूडियां चूभती है हाथों मे मेरे, जुबां से आह निकलती है,
लगता है ऐसे जैसे सीने मे मेरे किसीने छुरियां चला दी हैं..
ये तो बहुत रंगबिरंगी हैं..
एक दिन बडे ध्यान से देखा इन चूडियों कि तरफ ।
ये तो बहुत रंगबिरंगी थीं, क्या ग़लती है इनकी ?
बस अपना काम करती है ये, स्त्री का सौंदर्य बढाती है...
गंदी सोच तो समाज के ठेकेदारों कि है,
जो चूडी को हथकड़ी बना दी है......
कोई शिकायत नहीं अब इन चूडियों से मुझे..
कोई शिकायत नहीं अब इन चूडियों से मुझे ।
इनकी आवाज़ अब चूभती नहीं मेरे कानों मे,
अब यह बातें करने लगीं है मुझसे, हौसला दिलाने लगीं है मुझे...
अपनी आवाज़ से सबको मेरी मौजूदगी का एहसास कराती है ।
मैंने अब इन चूडियों को मजबूरी नहीं,
अपनी ताकत बना दी हैं..

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