कोशिशों कि लड़ीं हैं
दुनिया में समुंदरों कि कमी नहीं हैं ।
बस मुझे एक बूंद भी मिली नहीं हैं....
यंहा हर एक का आंगन गुलिस्तां से भरा हैं ।
बस मेरे चोकट पर कोई कली खिली नहीं हैं....
जिवन ने ना पुछो कहाँ कहाँ घूमाया हैं ।
कभी इस पद कभी उस पद चलाया हैं..
भटकता रहा दरबदर आस आस मे ।
बस मुझे मंजिल कभी मिली नहीं हैं....
आशाओं से भरा समुंदर हैं, उम्मीदों का पानी हैं ।
हर रोज मन का गोताखोर गोते लगता हैं, अंदर....
अभी तक कोई भी इनायत हुई नहीं हैं.....
अनगिनत हैं नाकामियाँँ,
और बरबादियों के साये भी बहुत गहरे हैं ।
शोर से लेकर सन्नाटों तक हम कहाँ कहाँ से गुजरे हैं
कस कर बांधली हैं फिर भी उम्मीदों कि दोर हौसलों से...
आज भी कोशिशों कि लड़ीं हाथों से छूटी नहीं हैं.....
कस कर बांधली हैं फिर भी उम्मीदों कि दोर हौसलों से...
आज भी कोशिशों कि लड़ीं हाथों से छूटी नहीं हैं.....


Nice. I LOVED that poem. Actually I also write POEMS in Hindi but don't know whether it comes in blogging. So I asked it on Quora. Thank you for answering. Here is my blog https://www.kagajkalam.com/न-मैं-तुझसे-कुछ-ज्यादा-न-तू/ please visit.
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